Thursday, May 10, 2018

वकील की हत्या के विरोध में कचहरी के वकीलों ने रोड वेज की बस में आग लगाई गुंडाराज सरकार के अपराध मुक्त अभियान की सरेआम धज्जियां उङायी जा रही है

इलाहाबाद के नमोहन पार्क के पास एडवोकेट राजेश कुमार श्रीवास्तव की दो बाइक सवारों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
 प्रशासन ने मृतक वकील के परिजनों के लिए 10 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की है। यह घटना एसे समय पर हुई जब प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी अपराध व कानून व्यवस्था की समीक्षा करने इलाहाबाद आए हुए हैं।

घटना सुबह 10.30 बजे आसपास की है। 45 वर्षीय राजेश श्रीवास्तव अपनी बाइक से कचहरी जा रहे थे। मनमोहन पार्क के पास दो अपराधियों ने पीछाकर उनकी कनपटी में गोली मारी और मौके पर ही उनकी मौत हो गयी। खास यह कि जिस स्थान पर वारादात हुई वहां से थोड़ी देर पहले ही मुख्य सचिव व डीजीपी का काफिला निकला था।


इस घटना से वकीलों में भारी आक्रोश है। सैकड़ों वकीलों ने सड़क जाम कर प्रदर्शन शुरू कर दिया है। एसएसपी आफिस के सामने बस में आग लगा दी है। अस्पताल में हंगामा चल रहा है, उनका कहना है कि इलाहाबाद में अपराध बेकाबू है। अपराधियों में कानून का डर नहीं रहा। दो दिन पहले ही फूलपुर में भाजपा नेता पवन केसरी की हत्या हुई थी। कुछ दिन पहले यूको बैंक में डकेती पड़ी और लुटेरे 17 लॉकर काटकर 10 करोड़ के गहने लूट ले गए। अभी तक इनमें एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है। दो पहले ही नवाबगंज में स्कूल प्रबंधक को सरे बाजार पीटकर मार डाला गया।

 वकील की हत्या के विरोध में कचहरी के वकीलों ने रोड वेज की बस में आग लगाई
गुंडाराज सरकार के अपराध मुक्त अभियान की सरेआम धज्जियां उङायी जा रही है आम आदमी सुरक्षित नहीं हैं जहां पुलिस बल का हुजूम हो जहां मिलिट्री छावनी हो जहां  हाई कोर्ट हो ...वहां सरेराह अधिवक्ता की हत्या कर दी गयी यें है ढोंगी सरकार की विफलता
अंधेर नगरी चौपट राजा पूरे प्रदेश में पूरी तरह से जंगलराज कायम
वकील की हत्या के पीछे एसएसपी आकाश कुलहरि जमीन का विवाद बता रहे हैं। उनका कहना है कि राजेश श्रीवास्तव जमीन किसी पुराने केस में पैरवी कर रहे थे। सबसे अहम कि डीजीपी शहर में अपराध की समीक्षा कर रहे और बीच सड़क पर वकील की हत्या हो गयी। वकीलों का आक्रोश देख पूरे शहर की फोर्स बुला ली गयी है।  

Sunday, May 6, 2018

जिन्ना के जिंद को जिंदा करना क्या 2019 की तैयारी तो नहीं ?

जिन्ना के  जिंद को जिंदा करना क्या 2019 की तैयारी तो नहीं ?


आज की तारीख में वर्तमान  केंद्र की जो सरकार है यह सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए तथा देश की जनता को मुद्दे से भटकाने के लिए जिन्ना के जिंद को फिर से जिंदा कर दिया क्योंकि सरकार के 5 साल होने वाले है जबकि 5 वर्षों के भीतर वर्तमान कि केंद्र की सरकार ने कोई काम नहीं किया तो ऐसी स्थिति में सरकार काम की बात करेगी तो जनता सरकार की कमियों को जान जाएगा जनता उनकीकमियों को जान ना जाए जनता को बताने के लिए  मुद्दा नहीं बचा तो सरकार के लोगों ने  षड्यंत्र से  जिन्ना के जिंद को  फिर से जिंदा कर दिया  जबकि भारतीय मुसलमानों ने जिन्ना को तो 1947 में ही नकार दिया था जब चुनने का वक्त आया तो जिन्ना का पाकिस्तान नहीं, गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद का भारत चुना। हम जिन्ना वाले नहीं, मौलाना आज़ाद वाले हैं।
AMU में 1938 से लटकी जिन्ना की फोटो का विरोध आज क्यों?
जिन्ना ना कभी हमारा आदर्श रहा है न रहेगा
ये तो मुल्क की समस्याओं से ध्यान हटाने का बहाना मात्र है, बेरोजगारी, नोट की कमी, बलात्कार आदि से ध्यान हटाने के लिए समय-समय पर ऐसे कार्यक्रम चलते रहेंगे अपने मुल्क में।
 सुनिए  विरोध होता तो ये विरोध *जिन्ना महल* का करते सुनिए ये विरोध जिन्ना का नहीं है ये तो 2019 की तैयारी है। अगर जिन्ना का विरोध होता तो ये विरोध *जिन्ना महल* का करते जिस पर महाराष्ट्र सरकार करोड़ो रूपये रख-रखाव में खर्च करती है। या फिर *जिन्ना टावर* का करते जिस पर आंध्रप्रदेश सरकार खर्च करती है। 


*जिन्ना के  जिंद को जिंदा करना क्या 2019 की तैयारी तो नहीं ?
*ब्रिटानिया बिस्किट*, *गो एयर*, आईपीएल की टीम *किंग्स एलेवन पंजाब*, और *वाडिया ग्रुप* का करते *जिसके मालिक जिन्ना की इकलौती बेटी, दीना जिन्ना के पुत्र नुस्ली वाडिया और जहांगीर वाडिया* हैं।
जिन्ना तो बहाना असली मक़सद मुल समस्याओं से हमारा आपका ध्यान हटाना है
जिन्ना का तस्वीर हटवाना कौन सी बड़ी समस्या है सरकार अगर चाहे तुरंत हटवा सकती है U.P की सरकार बिना हो हल्ला के ऐसा कर सकती थी लेकिन ऐसा करने से वोट का polorization कैसे होगा ? देशभक्ति की ब्रांडिंग कैसे होगी, ये वही लोग हैं जो जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाते हैं ये ढोंगी हैं ठग हैं पाकिस्तान जाते हैं बिरयानी खाते हैं तोहफ़ा लाते हैं और देश में जिन्ना का विरोध कर देशभक्ति का ढोंग करते हैं।

अरविंद सरोज 
छात्र नेता इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
इलाहाबाद

Wednesday, May 2, 2018

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सर्कुलर के विरुद्ध आंदोलन का आज 28 वा दिन।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सर्कुलर के विरुद्ध आंदोलन का आज 28 वा दिन।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ पर जारी अनशन का आज 28 वां दिन था।शोधकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार की एमएचआरडी मिनिस्ट्री धोखा कर रही है और उसने एसएलपी दायर करने की बात 10 दिन पहले ही कर दी थी। एसएलपी दायर भी हो गई ,किंतु आज तक न तो उसका डायरी नंबर मिला है न ही केस नंबर मिल पाया है,जिससे  संबंधित मामले का स्टेटस देखा जा सके। जब भी छात्रों द्वारा केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाता है, या तो slp दायर करती है या रिव्यू कराती है जैसा कि SC ST atrocities  के मामले में रिव्यू पिटीशन दायर की गई थी।किंतु अभी तक कुछ भी संतोषजनक परिणाम सामने नहीं आया है । 



आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं रंजीत सरोज ने कहा कि वर्तमान सरकार के मंत्री अपने मुखिया की तरह ही जुमला फेंकने में माहिर हो गए हैं और आए दिन नया झूठ बोलते रहते हैं आज ही अखबारों के माध्यम से पता चला कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्वीट के जरिए यह सूचना दी थी की आधार को मोबाइल नंबर से लिंक कराना जरूरी है यह सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है किंतु जब सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाई कि मैंने तो ऐसी गाइडलाइन जारी ही नही की तो उनकी बोलती बंद हो गई। आपको बता दें यह वही रविशंकर प्रसाद हैं जिन्होंने पिछले दिनों ABP न्यूज़ के एक इंटरव्यू में यह कहा था की हम सुप्रीम कोर्ट के फार्मूले से सहमत नहीं है इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट में UGC सर्कुलर के विरुद्ध एसएलपी दायर करेंगे, ध्यातव्य हो कि बहुत से मामलों में एसएलपी दायर की जा चुकी है किंतु वे फाइलें आज तक put-up तक नहीं हो पाई ,सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन या एसएलपी दायर करने की बात सुनकर बहुत से बुद्धिजीवी प्रोफेसर यह कहने लगे कि हमें सफलता मिल गई है और जल्द ही पुरानी व्यवस्था लागू हो जाएगी यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे लोग आंदोलन को मिस लीड कर रहे हैं जिससे कि आंदोलन समाप्त हो जाए  किंतु  ऐसा संभव नहीं है ।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ पर जारी अनशन का आज 28 वां दिन था।शोधकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार की एमएचआरडी मिनिस्ट्री धोखा कर रही है और उसने एसएलपी दायर करने की बात 10 दिन पहले ही कर दी थी। एसएलपी दायर भी हो गई ,किंतु आज तक न तो उसका डायरी नंबर मिला है न ही केस नंबर मिल पाया है,जिससे  संबंधित मामले का स्टेटस देखा जा सके। जब भी छात्रों द्वारा केंद्र सरकार पर दबाव बनाया जाता है, या तो slp दायर करती है या रिव्यू कराती है जैसा कि SC ST atrocities  के मामले में रिव्यू पिटीशन दायर की गई थी।किंतु अभी तक कुछ भी संतोषजनक परिणाम सामने नहीं आया है । आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं रंजीत सरोज ने कहा कि वर्तमान सरकार के मंत्री अपने मुखिया की तरह ही जुमला फेंकने में माहिर हो गए हैं और आए दिन नया झूठ बोलते रहते हैं आज ही अखबारों के माध्यम से पता चला कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्वीट के जरिए यह सूचना दी थी की आधार को मोबाइल नंबर से लिंक कराना जरूरी है यह सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है किंतु जब सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाई कि मैंने तो ऐसी गाइडलाइन जारी ही नही की तो उनकी बोलती बंद हो गई। आपको बता दें यह वही रविशंकर प्रसाद हैं जिन्होंने पिछले दिनों ABP न्यूज़ के एक इंटरव्यू में यह कहा था की हम सुप्रीम कोर्ट के फार्मूले से सहमत नहीं है इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट में UGC सर्कुलर के विरुद्ध एसएलपी दायर करेंगे, ध्यातव्य हो कि बहुत से मामलों में एसएलपी दायर की जा चुकी है किंतु वे फाइलें आज तक put-up तक नहीं हो पाई ,सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन या 

एसएलपी दायर करने की बात सुनकर बहुत से बुद्धिजीवी प्रोफेसर यह कहने लगे कि हमें सफलता मिल गई है और जल्द ही UI  व्यवस्था लागू हो जाएगी यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे लोग आंदोलन को मिस लीड कर रहे हैं जिससे कि आंदोलन समाप्त हो जाए  किंतु  ऐसा संभव नहीं है ।
 

अरविंद सरोज 
छात्र
 नेता इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद

Tuesday, May 1, 2018

*अंतर्राष्ट्रीय मजदूर*दिवस का संक्षिप्त इतिहास*
  मई दिवस के नाम से ही प्रख्यात 01 मई पूरी दुनिया में उनलोगों का महापर्व है जो असली चेहरे से सच्चे मायने में शोषण विहीन समाज की व्यवहारिक संरचना , समान कार्य के लिए पूरी तरह समान न्याय संवेदनशीलता के साथ मानवीय अधिकारों पर यकीन करते हैं ।


      दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है की मई दिवस में शामिल कई लोगों को विश्व के क्रन्तिकारी बलिदान पर्व के इतिहास की मामूली जानकारी तक नहीं है ।यदि नयी पीढ़ी मई दिवस के इतिहास से अन्जान ना रहे तो मेरी धारणा है की उनकी वाजिब सभी मांगें आंदोलनों के फलस्वरूप स्वतः कदम चूमेंगी । अतिसंक्षेप में इतिहास का निम्नवत रेखांकन कर रहा हूँ ।
          01 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों ने आम हड़ताल की थी इस हड़ताल की मांगों में मुख्य मांग  8 घंटे कार्य दिवस की थी । इसके अलावा साप्ताहिक अवकाश सहित मानवीय न्यूनतम जरूरतों को मांगे जाने की प्रार्थना की गई थी । 8 घंटे कार्यदिवस की मांग पृष्ठभूमि 1884 में तैयार हो चुकी थी । संगठित उद्योगों और मजदूर यूनियनों के फेडरेशन में 1884 में ही घोषणा कर दी थी की 01 मई 1886 से 8 घंटा श्रम का कानूनी कार्यदिवस होगा । अतः 01 मई 1886 को जनवादी आंदोलन का केंद्र तो शिकागो शहर बना लेकिन इस तिथि को सम्पूर्ण अमेरिका में 190000 मजदूरों ने मिल कारखानों में पूरी तरह काम ठप कर दिया।
उस समय मजदूरों से बड़ी बेरहमी के साथ 18 घंटे तक कार्य लिया जाता था । शिकागो आंदोलन का नेतृत्व  ऑगस्ट , स्पाइस और अलबर्ट पार्सन्स सहित वे मजदूर नेता कर रहे थे जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संघ गठित किया था । जुलुस की शक्ल में व्यापार मंडल या डाउन प्रेयरी के ओर से कूच किया जहाँ अमीर लोग रहा करते थे । उस समय मिल मालिकों को पुलिस का समर्थन प्राप्त था । 01 मई 1886 को मैकार्मिक रीपर कारखाने के कई निहत्थे  मजदूरों को पुलिस की बर्बरता से प्राण गंवाने पड़े । जानकारी के मुताबिक 6-7 मजदूर मारे गए थे ।  आंदोलन लगातार जारी रहा । 03 मई 1886 को आरा मिल मजदूर इसी मांग के समर्थन में आगे आये । इस सभा में भी 200 से अधिक पुलिस वालों ने मजदूरों पर हमला किया । 4 मई 1886 को पुलिस की हिंसा के विरोध में मजदूरों ने प्रदर्शन किया । इस तिथि को शांतिपूर्ण मजदूर प्रदर्शन के बीच में पुलिस घुस आई । इसी दौरान किसी ने पुलिस वालों के बीच बम फेंका जिनमे 7 की मौत हो गई । माना जाता है की बम फेंकने वाला मिल मालिकों का एजेंट था । इसी घटना के तहत पुलिस ने बम फेंकने का आरोप उन 8 मजदूर अग्रणी क्रांतिकारियों पर जबरन थोप दिया जो मजदूरों के मांगो की अगुवाई कर रहे थे । पार्संन , स्पाइस , माइकल, स्याबु , सैम्युल , फील्डन, अडोल्फ़ फिशर , जॉर्ज एंजेल , ऑस्कर निबे और लुइस लिंग को मुलजिम बना दिया गया । जब बम फेंका गया था उस समय पार्सन्न और स्पाइस तो वहां मौजूद तक नहीं थे । इसी क्रम में ग्रैंड जुरी को अलग से चिन्हित किया गया और दोषी ठहराया गया । सभी आरोपियों को मौत की सजा दी गयी । केवल निबे को 15 साल की कैद हुई । इस सजा ने पूरी दुनिया को आंदोलित किया । 13 नवंबर 1887 को शिकागो के मिल वावुकि सड़क पर 5 लाख मजदूर कतार बद्ध खड़े थे । लंबा इतिहास है किन्तु पूरी दुनिया को मजदूरों की मांगो के सामने माथा टेकना पड़ा । वर्तमान समय में भारत और दुनिया को तमाम मानवीय सुविधाएं 01 मई 1886 के मजदूर आंदोलन के आलोक में ही साम्राज्यवादियों व् पूंजीपतियों को देनी पड़ी । सभी शहीदों को श्रद्धांजलि ।
         01 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के संघर्ष की पृष्ठभूमि में ही भारत में भी श्रमजीवी वर्ग मद्रास से 1923 से मजबूत संगठनो के रूप में उभारना प्रारम्भ हुआ । केवल मिलों व् कारखानो के मजदूर ही नहीं सरकारी तथा गैर सरकारी शिक्षक , केंद्रीय एवम राज्यों के कर्मचारी स्वायत सासी संस्थानों , निगमों , बैंक कर्मचारियों , सफाई कर्मचारियों , दिहाड़ी मजदूरों से लेकर रिक्शा चालक तक अलग अलग संगठित हुए । जरुरत पड़ने पर एक साथ मिल कर भी आंदोलित हुए । इनमे संगठित वर्गों ने सामूहिक एकता की ताकत से अनेक मानवीय उपलब्धियां हांसिल की जो साम्राज्यवादी व्यवस्था देना नहीं चाहती थी । आज़ाद भारत होने के बाद भी शासक वर्ग और पूंजीवादी ताकतें संगठनो के संघर्षो के कारण ही कुछ ना कुछ न्याय देने को मजबूर हुई । असंगठित श्रमजीवी वर्ग को भी संगठित करने की एक ओर मुहिम धीमी गति से शुरू गई और दूसरी ओर पहले से संगठित वर्ग अपने अपने ट्रेड्स में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा पदलिप्सा तथा सत्ता एवम मालिकों से सौदेबाज़ी सहित कई बीमारियों से ग्रस्त हो गए । अपवाद के रूप में विभिन्न ट्रेड्स के नेता बचे जिनपर ऊँगली नहीं उठाई जा सकती है । संगठित सुपोषित प्रजाति जैसी दशा में आ गए । फलतः धार कुंठित हुई और अपनी अपनी  हबस में एकता बिखरने लगी ।
 इन हालात में संघर्षों से प्राप्त संवैधानिक उप्लाभ्धियां क्रमशः अगली पीढ़ी से सरकने लगी । पुरानी पेंशन योजना का ख़त्म होना और विद्यालयों की मान्यता की वित्त विहीन नीति मेरी नज़र में कुछ हद तक इन हालात से भी पैदा हुई । वर्तमान समय में शिक्षा , चिकित्सा सहित जन जीवन से जुड़ी कई अनिवार्यताएं संविधान के संकल्पों को तार-तार करके पूंजीवादी शिकंजे में जकड चुकी हैं ।



       ऐसा नहीं है कि पुरानी तर्ज़ पर हम सभी नए सिरे से सोंच कर अच्छी पहल करने की क्षमता नहीं रखते हैं । लेकिन यह तभी संभव है जब हमारे हृदयों में त्याग और उदारता का पारदर्शी सच्चा भाव हो । जो व्यक्ति या वर्ग खुशहाल हैं उनको उत्तराधिकारी पीढ़ी के लिए पूरे मनोयोग से निरंतर संघर्ष करना होगा ।
   
       आज़ाद भारत में राजनीतिक दलों ने युवा , किसान , व्यापारी , मजदूर , छात्र आदि ज़्यादातर वर्गों के दलीय संग़ठन बना कर प्रायः सभी को टुकड़ों में विभक्त और आपस में ही प्रतिद्वंदी बना दिया है । वर्ग संगठनो के नायक केवल अपनी अपनी धड़ बजवाने में मस्त और आह्लादित हैं ।संविधान के फ्रेम में जातिवादी खाई लगातार कुशलता से चौड़ी की जा रही है ।देश में काले धन की समानांतर अर्थ व्यवस्था स्थापित दृढ़ होकर धड़ल्ले से चल रही है । आर्थिक विषमता घटाकर-मिटाकर ही सामाजिक समानता की कल्पना तक संभव है । सभी ट्रेड्स के लोग जब संकिर्ताओं से परहेज़ करके समान न्याय के लिए एक साथ मजबूती से खड़े होंगे और दूसरे की त्रासदी मिटाने के लिए अन्य ट्रेड्स भी सामूहिक रूप से आगे आएंगे जो स्वतः उस त्रासदी के शिकंजे में नहीं हैं , तभी पूंजीवादी राजनीतिक व्यवस्था कल्याणकारी न्याय देने के लिए सोंचने को मजबूर होगी ।
          शिकागो की मजदूर क्रांति की क्रमबद्धता में संभव है मुझसे कहीं चूक हो गई हो । इस क्रांति के सिलसिले से पैदा दुनिया के अन्य देशों के मजदूर आंदोलनों का उल्लेख हमने नहीं किया है । दुनिया में जहाँ कहीं संविधान लागू है उनमे मौलिक अधिकारों के कुछ प्रावधान 01 मई 1886 से उपजी चिंतन धारा की देन है।
          काश ! आज भी हम अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग त्याग कर अपने-अपने ट्रेड्स में सुदृढ एकता के लिए प्रतिबद्ध हो पाते । सभी ट्रेड्स आत्मीयता से मिलकर विराट एकता को प्रखर मूर्त रूप देने की सबल इच्छा रखते ।          
 आइये , शहीदों से कृतज्ञता पूर्वक हमेशा प्रेरणा लेकर आपसी सदभाव एवम सुदृढ़ एकता के साथ मानवीय अधिकारों को सुरक्षित रखने तथा अर्जित करने हेतु सजग रहकर सार्थक प्रयासो की शुरुआत करें।          


अरविंद सरोज छात्र नेता :-इलाहाबाद विश्वविद्यालय,इलाहाबाद